(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.297. अध्यायः 297
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरं प्रति श्रेयःसाधनप्रतिपादकपराशरगीतानुवादः॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

पराशर उवाच। 12-297-0x(6444)(77367)
मनोरथरथं प्राप्य इन्द्रियार्थहयं नरः।
रश्मिभिर्ज्ञानसंभूतैर्यो गच्छति स बुद्धिमान्॥ 12-297-1(77368)
सेवाश्रितेन मनसा वृत्तिहीनस्य शस्यते।
द्विजातिहस्तान्निर्वृत्ता न तु तुल्यात्परस्परात्॥ 12-297-2(77369)
आयुर्नसुलभं लब्ध्वा नावकर्षेद्विशांपते।
उत्कर्षार्थं प्रयतते नरः पुण्येन कर्मणा॥ 12-297-3(77370)
वर्णेभ्यो हि परिभ्रष्टो न वै संमानमर्हति।
न तु यः सत्क्रियां प्राप्य राजसं कर्म सेवते॥ 12-297-4(77371)
वर्णोत्कर्षमवाप्नोति नरः पुण्येन कर्मणा।
दुर्लभं तमलब्धा हि हन्यात्पापेन कर्मणा॥ 12-297-5(77372)
अज्ञानाद्धि कृतं पापं तपसैवाभिनिर्णुदेत्।
पापं हि कर्म फलति पापमेव स्वयंकृतम्।
तस्मात्पापं न सेवेत कर्म दुःखफलोदयम्॥ 12-297-6(77373)
पापानुबन्धं यत्कर्म यद्यपि स्यान्महाफलम्।
तन्न सेवेत मेधावी शुचिः कुशलिनं यथा॥ 12-297-7(77374)
किंकष्टमनुपश्यामि फलं पापस्य कर्मणः।
प्रत्यापन्नस्य हि ततो नात्मा तावद्विरोचते॥ 12-297-8(77375)
प्रत्यापत्तिश्च यस्येह बालिशस्य न जायते।
तस्यापि सुमहांस्तापः प्रस्थितस्योपजायते॥ 12-297-9(77376)
विरक्तं शोध्यते वस्त्रं न तु कृष्णोपसंहितम्।
प्रयत्नेन मनुष्येन्द्र पापमेवं निबोध मे॥ 12-297-10(77377)
स्वयं कृत्वा तु यः पापं शुभमेवानुतिष्ठति।
प्रायश्चित्तं नरः कर्तुमुभयं सोऽश्नुते पृथक्॥ 12-297-11(77378)
अज्ञानात्तु कृतां हिंसामहिंसा व्यपकर्षति।
ब्राह्मणाः शास्त्रनिर्देशादित्याहुर्ब्रह्मवादिनः॥ 12-297-12(77379)
तथा कामकृतं नास्य विहिंसैवानुकर्षति।
इत्याहुर्ब्रह्मशास्त्रज्ञा ब्राह्मणा ब्रह्मवादिनः॥ 12-297-13(77380)
अहं तु तावत्पश्यामि कर्म यद्धर्तते कृतम्।
गुणयुक्तं प्रकाशं वा पापेनानुपसंहितम्॥ 12-297-14(77381)
यथा सूक्ष्माणि कर्माणि फलन्तीह यथातथम्।
बुद्धियुक्तानि तानीह कृतानि मनसा सह॥ 12-297-15(77382)
भवत्यल्पफलं कर्म सेवितं नित्यमुल्वणम्।
अबुद्धिपूर्वं धर्मज्ञ कृतमुग्रेण कर्मणा॥ 12-297-16(77383)
कृतानि यानि कर्माणि दैवतैर्मुनिभिस्तथा।
न चरेत्तानि धर्मात्मा श्रुत्वा चापि न कुत्सयेत्॥ 12-297-17(77384)
संचिन्त्य मनसा राजन्विदित्वा शक्तिमात्मनः।
करोति यः शुभं कर्म स वै भद्राणि पश्यति॥ 12-297-18(77385)
नवे कपाले सलिलं संन्यस्तं हीयते यथा।
नवेतरे तथा भावं प्राप्नोति सुखभावितम्॥ 12-297-19(77386)
सतोयेऽन्यत्तु यत्तोयं तस्मिन्नेव प्रसिच्यते।
तद्धि वृद्धिमवाप्नोति सलिले सलिलं यथा॥ 12-297-20(77387)
एवं कर्माणि यानीह बुद्धियुक्तानि पार्थिव।
समानि चैव यानीह तानि पुण्यतमान्यपि॥ 12-297-21(77388)
राज्ञा जेतव्याः शत्रवश्चोन्नताश्च
सम्यक्कर्तव्यं पालनं च प्रजानाम्।
अग्निश्चेयो बहुभिश्चापि यज्ञै
रन्त्ये मध्ये वा वनमाश्रित्य स्थेयम्॥ 12-297-22(77389)
दमान्वितः पुरुषो धर्मशीलो
भूतानि चात्मानमिवानुपश्येत्।
गरीयसः पूजयेदात्मशक्त्या
सत्येन शीलेन सुखं नरेन्द्र॥ ॥ 12-297-23(77390)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि सप्तनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ 297॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-297-2 द्विजातिहीना निर्वृत्ता इति थ. पाठः॥ 12-297-5 दुर्लभं जन्म लब्ध्या हीति थ. पाठः। दुष्कृतं कर्म लब्ध्या हीति ध. पाठः॥ 12-297-7 कुशलिनं कारुकं चण्डालविशेषमित्यर्थः॥ 12-297-8 कुत्सितं च तत्कष्टं च किंकष्टम्॥ 12-297-9 प्रत्यापत्तिर्वैराग्यम्॥ 12-297-11 सोऽश्नुते फलमिति ध. पाठः॥ 12-297-23 दयान्वितः पुरुष इति थ. पाठः॥


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